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बृहत्संहिता • अध्याय 65 • श्लोक 8
ऋष्यशिरोरुहपादो यो वा प्राक् पाण्डुरोऽपरे नीलः । स भवति शुभकृच्छागः श्लोकश्चाप्यत्र गर्योक्तः ॥
जिसके ऋष्य (काला मृए) के समान शिर के बाल और पाँव हों या अगले भाग में पाण्डुर वर्ण और पिछले भाग में नीला वर्ण हो, वह छाग शुभ होता है। इस छाग को 'वामन' कहते हैं। इसी प्रकार से गर्ग मुनि ने भी वामनसंज्ञक छाग का लक्षण स्वप्रणीत श्लोक में बतलाया है।
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