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अध्याय 29 — अथ कुसुमलताध्धायः
बृहत्संहिता
14 श्लोक • केवल अनुवाद
वृक्षों में फल और फूलों की वृद्धि देखकर द्रव्यों की सुलभता तथा धान्यों की निष्पत्ति जाननी चाहिये ।
शाल पृक्ष पर फल और फूलों की वृद्धि से कलम शालो (जड़हन धान्य आदि), रक्त अशोक से रक्त धान्य, दूधी से पाण्डूक और नील अशोक पर फल, फूलों को वृद्धि से सूकरक (धान्यविशेष) की वृद्धि जाननी चाहिये।
वटवृक्ष से यन, तिन्दुक (तेंदुआ) से साठी धान्य और पीपल से सब धान्यों की वृद्धि देखनी चाहिये।
जामुन से तिल, माप आदि, शिरीष (शिरस) से प्रियङ्गु (कफुनी = कौनी ), महुए से गेहूँ और सप्तवर्ण वृक्ष पर फल, फूल की वृद्धि से यव की वृद्धि जाननी चाहिये।
यासन्ती लता और कुन्द पुष्यों में फल-पुष्पों को वृद्धि से कृपास, असना से सरसों, बेर से कुलथी और करन में फल-पुष्पों की वृद्धि से मूंग की वृद्धि जाननी चाहिये।
चेतस वृध में फल-पुष्यों की वृद्धि से असली (तोसी), पलास से कोदों, तितक से शंख, मोती और चाँदी की तया इगुदी वृधों में फल-पुष्यों से मन की वृद्धि जाननी चाहिने।
हस्तिकर्ण वृक्ष पर फल-पुष्पों की वृद्धि से हाथो, अश्वकर्ण से घोड़ा, पाटला से गाय और कदली वृक्ष पर फल-पुष्पों की वृद्धि से बकरी, भेड़ आदि की वृद्धि होती है।
चम्पापुष्प की वृद्धि से सोना, बन्धुजीव से मूंगा, कुरवक से यज्ञ और नन्दिकावर्त से वैदूर्य मणि को वृद्धि होती है।
सिन्धुयास से मोती, कुसुम्भ से केशर, रक्त कमल से राजा और नील कमल से मन्त्री की वृद्धि देखनी चाहिये ।
सुवर्ण पुष्प से व्यापारी, कमल से ब्राह्मण, कुमुद से पुरोहित, सुगन्धित वस्तु से सेनापति और आक से सोने की वृद्धि देखनी चाहिये।
आम को वृद्धि से मनुष्यों को कुशल, भल्लातक से भय, पीलु से आरोग्य, खैर तथा शमी से दुर्भिक्ष और अर्जुन वृक्ष से सुन्दर वृष्टि कहनी चाहिये।
निम्ब और नागकेसर पर पुष्यों को वृद्धि से सुभिक्ष, कपित्थ से वायु, निचुल से अवृष्टि का भय और कुटज से व्याधिभय का ज्ञान करना चाहिये।
दूब और कुश के पुष्पों की वृद्धि से ईख (गन्ना), कचनार से आग और श्याम लता की वृद्धि से वेश्या, व्यभिचारिणी आदि खो की वृद्धि होती है।
जिस समय वृधगुल्म (फैली लता) और लताओं के पत्ते चिकने तथा छिद्ररहित दिखाई दें, उस समय सुन्दर वृष्टि होती है। यदि वे (पसे) रूक्ष और छिद्रयुत हों तो थोड़ी मुहि होती है।
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