Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 20 — अथ ग्रहशृङ्गाटकाध्यायः
बृहत्संहिता
9 श्लोक • केवल अनुवाद
जिस दिशा में सभी ताराग्रह (मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) दिखाई दें तथा जिस दिशा में रवि में प्रविष्ट ( अस्त) हों, उस दिशा में शत्रकोप, क्षुधा ( दुर्भिक्ष) और आतङ्क (उपद्रव) का भय होता है।
दि ग्रहसंस्थान ( ग्रह की आकृति) चक्र, धनु, शृङ्गाटक (त्रिकोण), दण्ड, पुर, प्रास (आयुधविशेष), कुन्त, वज्र या मध्य में कृश और दोनों तरफ विस्तीर्ण हो तो पृथ्यो पर सब जगह दुर्भिक्ष, अवृष्टि एवं मनुष्यों में और राजाओं में युद्ध होता है।
सूर्य के अस्तसमय में जिस देश के आकाशभाग में ग्रहमाला दिखाई दे, वहाँ पर अन्य राजा का आगमन और दूसरे राजा का उपद्रव होता है।
जिस नक्षत्र के साथ ग्रहों का समागम होता है, उस नक्षत्र के नक्षत्रकूर्म और नक्षत्रव्यूह में उक्त जनों का नाश करता है। यदि वे दोनों (ग्रह, नक्षत्र) परस्पर निर्मल किरण माले हों तो उनका कुशल करते हैं।
ग्रहसंवर्त, ग्रहसमागम, ग्रहसम्मोह, ग्रहसमाज, ग्रहसत्रिपात और ग्रहकोश-ये छः योग हैं। अब इनका लक्षण और फल कहते हैं।
एक नक्षत्र में पौर के साथ पापी ग्रह मिल कर चार या पाँच संख्यक हों तो संवर्त, केतु या राहु हो तो सम्मोह
पौरग्रह के साथ पौरग्रह या पापी ग्रह के साथ पापी ग्रह हो तो समाज, शनैश्वर और गुरु के संयोग में कोई दूसरा ग्रह आ जाय तो कोश
दूसरा ग्रह आ जाय तो कोश, एक ग्रह पद्धिम दिशा में और दूसरा पूर्व दिशा में उदित होकर दोनों एक नक्षत्रगत हों तो सनिपात तथा उक्त पाँचों लक्षणों से भित्र लक्षणयुक्त होने से समागम होता है। इस समागन में ताराग्रह निर्विकार शरीर वाले, निर्मल और विपुल विम्ब माले शुग होते हैं।
सम्मोह और कोश में प्रजाओं को भय, समाज में सुसम (पूर्व से पश्चात् अधिक फल) और सत्रिपात में परस्पर द्वेष होता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें