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बृहत्संहिता • अध्याय 20 • श्लोक 8
उदितः पश्चादेकः प्राक् चान्यो यदि स सन्निपाताख्यः । अविकृततनवः स्निग्धा विपुलाच समागमे धन्याः ॥
दूसरा ग्रह आ जाय तो कोश, एक ग्रह पद्धिम दिशा में और दूसरा पूर्व दिशा में उदित होकर दोनों एक नक्षत्रगत हों तो सनिपात तथा उक्त पाँचों लक्षणों से भित्र लक्षणयुक्त होने से समागम होता है। इस समागन में ताराग्रह निर्विकार शरीर वाले, निर्मल और विपुल विम्ब माले शुग होते हैं।
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