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अध्याय 107 — अथोपसंहाराध्यायः

बृहत्संहिता
6 श्लोक • केवल अनुवाद
मैंने (वराहमिहिर ने) बुद्धिरूप मन्दराचल के द्वारा ज्यौतिष शास्त्ररूप समुद्र का अच्छी प्रकार से मन्धन करके संसार को प्रकाशित करने वाले शाखरूप चन्द्र को बाहर निकाला है।
इस शास्त्र को बनाते हुये मैंने पूर्वाचार्यकृत ग्रन्थों के आशयों को नहीं छोड़ा है। अतः उन पूर्वाचार्यकृत ग्रन्थों को और इस शाख को यत्नपूर्वक देखकर पण्डितों को प्रयत्न करना चाहिये अर्थात् जो अच्छा हो, उसको ग्रहण करना चाहिये ।
अथवा सुजन मनुष्य दोषरूप समुद्र में थोड़ा-सा भी गुण देखकर उसका विस्तार करते हैं; परन्तु नोच पुरुष इससे विपरीत स्वभाव का होर है अर्थात् गुणों को छिपाता है और स्वल्प दोष का भो विस्तार करता है। यही साधु (सन्जन) और असाधु (दुर) का लक्षण है।
काव्यरूप सुवर्ण दुर्जनरूप अग्नि द्वारा तपाये जाने पर विशुद्धि को प्राप्त होता है। इसलिये दुर्जन मनुष्य को यत्नपूर्वक शास्त्र का श्रवण कराना चहिये ।
प्रचारोन्मुख इस ग्रन्थ में लेखक-दोष से जो अशुद्धियाँ रह जायँ या जो मेरे द्वारा आगम-विरुद्ध किया गया हो और जो नहीं किया गया हो, वह सब मत्सरता का परित्याग कर बहुश्रुत मनुष्यों के मुख से सुन कर पण्डितों को यहाँ पर ठीक कर लेना चाहिये। अस्य ग्रन्थस्य प्रचरतः प्रचरमाणस्य यद्विनाशमेत्यपशब्दतां गच्छति। लेख्याद् लेखक- दोषाद् बहुश्रुतमुखाधिगमक्रमेण बहुश्रुता ये जनास्तन्मुखेभ्योऽधिगमः प्राप्तिस्तस्य क्रमेण परिपाट्या पूर्वापरपर्यालोचनयाऽर्थासङ्गोत्पत्तेर्येऽपशब्दं जानन्ति तदत्रास्मिन् शाखे विदुषा रागं परिहत्य कार्यम्। तन्मुखेभ्योऽधिगम्य विदुषा पण्डितेन रागं मात्सर्य परिहत्य त्यक्त्वा कार्य कर्तव्यम्। तथा यद्वा मया कुकृतं कुत्सितमनागमेन कृतं विरचितमल्पं वा परिमितम- व्यापकं कृतं वा इहारिमन् शास्त्रे मूलादेवाकृतं यत्र कृतं तदत्रास्मिन् शाखे विदुषा रागं परिहत्य कार्यमिति ।
सूर्य, मुनिगण और गुरुजनों के चरणों में नमस्कारजन्य अनुग्रह से उत्पन्न बुद्धि के द्वारा इस ग्रन्थ का संग्रह मैंने किया है। अतः पूर्वाचार्यों के लिये मेरा नमस्कार है।।६।। इति 'विमला' हिन्दीटीकायामुसंहाराध्यायः सप्ताधिकशततमः
Krishjan
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