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बृहत्संहिता • अध्याय 107 • श्लोक 4
दुर्जनहुताशतप्तं काव्यसुवर्ण विशुद्धिमायाति । श्रावयितव्यं तस्माद् दुष्टजनस्य प्रयत्नेन ॥
काव्यरूप सुवर्ण दुर्जनरूप अग्नि द्वारा तपाये जाने पर विशुद्धि को प्राप्त होता है। इसलिये दुर्जन मनुष्य को यत्नपूर्वक शास्त्र का श्रवण कराना चहिये ।
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