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बृहत्संहिता • अध्याय 107 • श्लोक 6
दिनकरमुनिगुरुचरणप्रणिपातकृतप्रसादमतिनेदम् । शास्त्रमुपसङ्गृहीतं नमोऽस्तु पूर्वप्रणेतृभ्यः ॥
सूर्य, मुनिगण और गुरुजनों के चरणों में नमस्कारजन्य अनुग्रह से उत्पन्न बुद्धि के द्वारा इस ग्रन्थ का संग्रह मैंने किया है। अतः पूर्वाचार्यों के लिये मेरा नमस्कार है।।६।। इति 'विमला' हिन्दीटीकायामुसंहाराध्यायः सप्ताधिकशततमः
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