इस शास्त्र को बनाते हुये मैंने पूर्वाचार्यकृत ग्रन्थों के आशयों को नहीं छोड़ा है। अतः उन पूर्वाचार्यकृत ग्रन्थों को और इस शाख को यत्नपूर्वक देखकर पण्डितों को प्रयत्न करना चाहिये अर्थात् जो अच्छा हो, उसको ग्रहण करना चाहिये ।
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