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बृहत्संहिता • अध्याय 107 • श्लोक 3
अथवा कृशमपि सुजनः प्रथयति दोषार्णवाद् गुणं दृष्ट्वा । नीचस्तद्विपरीतः प्रकृतिरियं साध्वसाधूनाम् ॥
अथवा सुजन मनुष्य दोषरूप समुद्र में थोड़ा-सा भी गुण देखकर उसका विस्तार करते हैं; परन्तु नोच पुरुष इससे विपरीत स्वभाव का होर है अर्थात् गुणों को छिपाता है और स्वल्प दोष का भो विस्तार करता है। यही साधु (सन्जन) और असाधु (दुर) का लक्षण है।
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