ग्रन्थस्य यत् प्रचरतोऽस्य विनाशमेति लेख्याद् यद्वा मया बहुश्रुतमुखाधिगमक्रमेण । कुकृतमल्पमिहाकृतं वा कार्य तदत्र विदुषा परिहृत्य रागम् ॥
प्रचारोन्मुख इस ग्रन्थ में लेखक-दोष से जो अशुद्धियाँ रह जायँ या जो मेरे द्वारा आगम-विरुद्ध किया गया हो और जो नहीं किया गया हो, वह सब मत्सरता का परित्याग कर बहुश्रुत मनुष्यों के मुख से सुन कर पण्डितों को यहाँ पर ठीक कर लेना चाहिये।
अस्य ग्रन्थस्य प्रचरतः प्रचरमाणस्य यद्विनाशमेत्यपशब्दतां गच्छति। लेख्याद् लेखक- दोषाद् बहुश्रुतमुखाधिगमक्रमेण बहुश्रुता ये जनास्तन्मुखेभ्योऽधिगमः प्राप्तिस्तस्य क्रमेण परिपाट्या पूर्वापरपर्यालोचनयाऽर्थासङ्गोत्पत्तेर्येऽपशब्दं जानन्ति तदत्रास्मिन् शाखे विदुषा रागं परिहत्य कार्यम्। तन्मुखेभ्योऽधिगम्य विदुषा पण्डितेन रागं मात्सर्य परिहत्य त्यक्त्वा कार्य कर्तव्यम्। तथा यद्वा मया कुकृतं कुत्सितमनागमेन कृतं विरचितमल्पं वा परिमितम- व्यापकं कृतं वा इहारिमन् शास्त्रे मूलादेवाकृतं यत्र कृतं तदत्रास्मिन् शाखे विदुषा रागं परिहत्य कार्यमिति ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।