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अध्याय 1 — साक्षी

अष्टावक्र गीता
20 श्लोक • केवल अनुवाद
राजा जनक ने पूछा— “हे प्रभु! मनुष्य ज्ञान कैसे प्राप्त करता है? मुक्ति कैसे प्राप्त होती है? और वैराग्य किस प्रकार प्राप्त होता है? कृपया मुझे यह बताइए।”
अष्टावक्र ने कहा— “हे तात! यदि तुम मुक्ति चाहते हो, तो विषयों (इन्द्रिय-भोगों) को विष के समान त्याग दो। क्षमा, सरलता, दया, संतोष और सत्य का अमृत के समान सेवन करो।”
तुम न पृथ्वी हो, न जल, न अग्नि, न वायु, और न आकाश हो। मुक्ति के लिए अपने आपको इन सबका साक्षी, शुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मा जानो।
यदि तुम अपने को देह से पृथक् करके शुद्ध चैतन्य में स्थित हो जाओ और उसी में विश्राम करो, तो इसी क्षण तुम सुखी, शान्त और बन्धन से मुक्त हो जाओगे।
तुम न ब्राह्मण आदि कोई वर्ण हो, न किसी आश्रम के हो, और न ही इन्द्रियों की पहुँच में आने वाले हो। तुम असंग, निराकार और समस्त विश्व के साक्षी हो। इस सत्य को जानकर सुखी रहो।
हे विभो! धर्म और अधर्म, सुख और दुःख—ये सब मन के विषय हैं; तुम्हारे नहीं। तुम न कर्ता हो, न भोक्ता। तुम तो सदा से ही मुक्त हो।
तुम ही सबके एकमात्र द्रष्टा हो और वास्तव में सदा से ही मुक्तस्वरूप हो। तुम्हारा बन्धन केवल यही है कि तुम अपने को द्रष्टा से भिन्न किसी अन्य रूप में देखते हो।
‘मैं कर्ता हूँ’—इस अहंकाररूपी महाकाले सर्प के दंश से तुम पीड़ित हो। ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’—इस विश्वासरूपी अमृत का पान करके सुखी हो जाओ।
मैं एक, विशुद्ध ज्ञान हूँ, इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान वन को जला दें, इस प्रकार शोकरहित होकर सुखी हो जाएँ।
जहाँ ये विश्व रस्सी में सर्प की तरह अवास्तविक लगे, उस आनंद, परम आनंद की अनुभूति करके सुख से रहें।
स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है।
आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक, मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छा रहित एवं शांत है। भ्रमवश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है।
अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और 'मैं' के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें।
हे पुत्र! बहुत समय से आप 'मैं शरीर हूँ' इस भाव बंधन से बंधे हैं, स्वयं को अनुभव कर, ज्ञान रूपी तलवार से इस बंधन को काटकर सुखी हो जाएँ।
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है।
यह विश्व तुम्हारे द्वारा व्याप्त किया हुआ है, वास्तव में तुमने इसे व्याप्त किया हुआ है। तुम शुद्ध और ज्ञानस्वरुप हो, छोटेपन की भावना से ग्रस्त मत हो।
आप इच्छारहित, विकाररहित, घन (ठोस), शीतलता के धाम, अगाध बुद्धिमान हैं, शांत होकर केवल चैतन्य की इच्छा वाले हो जाइये।
आकार को असत्य जानकर निराकार को ही चिर स्थायी मानिये, इस तत्त्व को समझ लेने के बाद पुनः जन्म लेना संभव नहीं है।
जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप उसके अन्दर भी है और बाहर भी, उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर भी निवास करता है और उसके बाहर भी।
जिस प्रकार एक ही आकाश पात्र के भीतर और बाहर व्याप्त है, उसी प्रकार शाश्वत और सतत परमात्मा समस्त प्राणियों में विद्यमान है।
Krishjan
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