तुम न ब्राह्मण आदि कोई वर्ण हो, न किसी आश्रम के हो, और न ही इन्द्रियों की पहुँच में आने वाले हो। तुम असंग, निराकार और समस्त विश्व के साक्षी हो। इस सत्य को जानकर सुखी रहो।
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