मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अष्टावक्र गीता • अध्याय 1 • श्लोक 5
न त्वं विप्रादिको वर्ण: नाश्रमी नाक्षगोचर:। असङगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव॥
तुम न ब्राह्मण आदि कोई वर्ण हो, न किसी आश्रम के हो, और न ही इन्द्रियों की पहुँच में आने वाले हो। तुम असंग, निराकार और समस्त विश्व के साक्षी हो। इस सत्य को जानकर सुखी रहो।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अष्टावक्र गीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अष्टावक्र गीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें