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अष्टावक्र गीता • अध्याय 1 • श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच - मुक्तिमिच्छसि चेत्तात्, विषयान विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयातोष, सत्यं पीयूषवद्भज॥
श्री अष्टावक्र उत्तर देते हैं - यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो अपने मन से विषयों (वस्तुओं के उपभोग की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये। क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये।
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