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अष्टावक्र गीता • अध्याय 1 • श्लोक 13
कूटस्थं बोधमद्वैत- मात्मानं परिभावय। आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम्॥
अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और 'मैं' के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें।
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