एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥
तुम ही सबके एकमात्र द्रष्टा हो और वास्तव में सदा से ही मुक्तस्वरूप हो। तुम्हारा बन्धन केवल यही है कि तुम अपने को द्रष्टा से भिन्न किसी अन्य रूप में देखते हो।
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