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अष्टावक्र गीता • अध्याय 1 • श्लोक 7
एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा। अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥
आप समस्त विश्व के एकमात्र दृष्टा हैं, सदा मुक्त ही हैं, आप का बंधन केवल इतना है कि आप दृष्टा किसी और को समझते हैं।
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