मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 1 — प्रणवोपनिषद्

प्रणव
13 श्लोक • केवल अनुवाद
अब ब्रह्म स्वरूप भगवान् विष्णु के अद्भुत कर्मों से युक्त, (संचित कर्मों को भस्मसात् करने में समर्थ) अग्नि को धारण करने वाली ब्रह्मविद्या का रहस्य वर्णित किया जा रहा है।
ब्रह्मवेत्ताओं ने ॐकार को ही एक अद्वितीय, अविनाशी ब्रह्म कहा है, उसके शरीर, स्थान और कालत्रय (भूत, भविष्यत् और वर्तमान) का विवेचन अब किया जाता है।
उस ॐकार रूप ब्रह्म में तीन देवता, (ब्रह्मा, विष्णु, महेश), तीन लोक (भूः, भुवः, स्वः), तीन वेद (ऋक्, यजुष, साम), तीन अग्नियाँ (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय), तीन पूर्ण मात्रा और एक अर्धमात्रा (अ, उ, म् एवं अनुस्वार) सन्निहित हैं। वहीं उसका साक्षात् कल्याणकारी शिव स्वरूप है।
ऋग्वेद, पृथ्वी, गार्हपत्य अग्नि और देव ब्रह्मा— ये तत्त्व ब्रह्मवेत्ताओं ने ॐकार के तीन अक्षरों में अकार के शरीर रूप में बताये हैं।
यजुर्वेद, अन्तरिक्ष, दक्षिणाग्नि और भगवान् विष्णु— ये सब तत्त्व ॐकार के तीन अक्षरों में उकार के स्वरूप में निरूपित किये गये हैं।
सामवेद, द्युलोक, आहवनीय अग्नि और महादेव शिव— ये सब ॐकार के तीन अक्षरों में से मकार के स्वरूप में निरूपित हुए हैं।
सूर्य मण्डल का जो स्वरूप है, वह ॐकार के अक्षरों में अकार का स्वरूप है। चन्द्रमण्डल का स्वरूप उकार से निरूपित है, जो इस ॐकार के मध्य में अवस्थित है।
ॐकार का अन्तिम अक्षर मकार, उस अग्नि स्वरूप में है, जो धूम्ररहित है, विद्युत् सदृश है। ॐकार की तीनों मात्राओं को चन्द्र, सूर्य और अग्नि के तेजस् के स्वरूप में समझना चाहिए।
दीपक की ज्योतिशिखा के स्वरूप में, जिसमें शिखा ऊर्ध्वगामी हो, उस प्रणव अक्षर ‘ॐकार’ के ऊपर स्थित अर्द्धचन्द्र-अर्द्ध मात्रा को समझना चाहिए।
दूसरी कमल सूत्र (कमल नाल) के सदृश सूक्ष्म शिखा की कान्ति (मस्तक प्रदेश में) दृष्टिगोचर होती है, वह नासारन्ध्र से सूर्यवत् तेज को धारण कर सूर्यमण्डल का भेदन कर वहाँ स्थित है।
अग्नि स्वरूप में वह शिखा (ॐकार की अर्द्धमात्रा) बहत्तर हजार नाड़ियों के द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों को वर (जीवन-प्राण) देने वाली और सब को व्याप्त करके अवस्थित है।
जब मुमुक्षु मोक्ष प्राप्ति के निकट शान्त स्थिति को प्राप्त होता है, तो काँसे के घण्टे के समान निनाद सुनाई देता है, यह ॐ कार का ही स्वरूप है। इस स्वरूप को सभी साधक सुनने की इच्छा करते हैं।
जो साधक (उक्त) ओङ्कार स्वरूप शब्द नाद में लीन हो जाता है, वह ब्रह्मस्वरूप ही कहा जाता है। वही अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है, यह सुनिश्चित है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें