ब्रह्मवेत्ताओं ने ॐकार को ही एक अद्वितीय, अविनाशी ब्रह्म कहा है, उसके शरीर, स्थान और कालत्रय(भूत, भविष्यत् और वर्तमान) का विवेचन अब किया जाता है।
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