अग्नि स्वरूप में वह शिखा(ॐकार की अर्द्धमात्रा) बहत्तर हजार नाड़ियों के द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों को वर(जीवन-प्राण) देने वाली और सब को व्याप्त करके अवस्थित है।
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