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अध्याय 6 — वैराग्य

प्रबोधसुधाकर
8 श्लोक • केवल अनुवाद
दूसरे के गृह, स्त्री, पुत्र और धनादि के आने-जाने से होने वाले हर्ष या विषाद क्या वहाँ क्षणभर ठहरने वाले पुरुष को हो सकते हैं!
इसी प्रकार मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि घर में अतिथि के समान रहे; किसी भी स्तुत्य अथवा तुच्छ विषय को दैववश स्थित अथवा गया हुआ देखकर न तो सन्तुष्ट ही हो और न दुःख ही माने।
अपनेपन के अभिमान से शून्य तथा विषयों से विमुख रहने वाला पुरुष अपने घर में रहता हुआ भी कर्मों से कभी बाधित नहीं होता।
हरी-भरी घास और सुकोमल श्वेत बालुका से ढके हुए किसी वन्य-प्रदेश में वृक्ष की शीतल छाया में सुखपूर्वक सोते हुए पुरुष के
फल-दल से युक्त वृक्ष, मन्द सुगन्ध शीतल वायु, सब ओर सुन्दर कलरव करते हुए पक्षी और नदियाँ भी क्या मित्र नहीं बन जाते? (अर्थात् क्या इन सबमे उसका चित्त नहीं बहल जाता?)
संसार में वैराग्यरूपी सौभाग्य के पात्र, प्रसन्नचित्त, विषयाशा-दीन और यथा-प्राप्त प्रारब्ध-फल भोगने वाले पुरुष को इसी जन्म में कृतार्थता प्राप्त हो जाती है।
जिस प्रकार असावधानतावश हाथ से गिरा हुआ पदार्थ तो शोक का कारण होता है, किन्तु यदि उसे किसी श्रोत्रिय ब्राह्मण को दान कर दिया जाय तो वही सन्तोष और शुभ गति का देने वाला हो जाता है, उसी प्रकार यदि विषय अपने-आप छूटते हैं तब तो बहुत दिनों तक खटकते रहते हैं; किन्तु यदि उन्हें अपनी इच्छा से छोड़ा जाय तो वे सुख और कल्याण के देने वाले हो जाते हैं।
अपने निवासस्थान को भूलकर चिरकाल तक इस भयङ्कर संसार-वन में भटकता और तापत्रयरूपी प्रचण्ड दावानल की ज्वाला-मालाओं से व्याकुल होकर तुच्छ विषयों के लिये उछलता-कूदता यह चमकीली आँखों वाला चित्तरूपी हरिण आशा-पाश में पड़ा हुआ ही विषयरूपी व्याघ्रो द्वारा बेमौत मारा जाता है।
Krishjan
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