दैवात्स्थितं गतं वा यं कंचिद्विषयमीड्यमल्पं वा ।
नो तुष्यन्न च सीदन्वीक्ष्य गृहेष्वतिथिवन्निवसेत् ॥
इसी प्रकार मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि घर में अतिथि के समान रहे; किसी भी स्तुत्य अथवा तुच्छ विषय को दैववश स्थित अथवा गया हुआ देखकर न तो सन्तुष्ट ही हो और न दुःख ही माने।
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