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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 6 • श्लोक 4
कुत्राप्यरण्यदेशे सुनीलतृणवालिकोपचिते । शीतलतरुतलभूमौ सुखं शयानस्य पुरुषस्य ॥
हरी-भरी घास और सुकोमल श्वेत बालुका से ढके हुए किसी वन्य-प्रदेश में वृक्ष की शीतल छाया में सुखपूर्वक सोते हुए पुरुष के
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