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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 6 • श्लोक 5
तरवः पत्रफलाढ्याः सुगन्धशीतानिलाः परितः । कलकूजितवरविहगाः सरितो मित्राणि किं न स्युः ॥
फल-दल से युक्त वृक्ष, मन्द सुगन्ध शीतल वायु, सब ओर सुन्दर कलरव करते हुए पक्षी और नदियाँ भी क्या मित्र नहीं बन जाते? (अर्थात् क्या इन सबमे उसका चित्त नहीं बहल जाता?)
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