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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 6 • श्लोक 8
विस्मृत्यात्मनिवासमुत्कटभवाटव्यां चिरं पर्यट- न्संतापत्रयदीर्घदावदहनज्वालावलीव्याकुलः । वल्गन्फल्गुषु सुप्रदीप्तनयनश्चेतःकुरङ्गो बला- दाशापाशवशीकृतोऽपि विषयव्याघ्रैर्मृषा हन्यते ॥
अपने निवासस्थान को भूलकर चिरकाल तक इस भयङ्कर संसार-वन में भटकता और तापत्रयरूपी प्रचण्ड दावानल की ज्वाला-मालाओं से व्याकुल होकर तुच्छ विषयों के लिये उछलता-कूदता यह चमकीली आँखों वाला चित्तरूपी हरिण आशा-पाश में पड़ा हुआ ही विषयरूपी व्याघ्रो द्वारा बेमौत मारा जाता है।
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