द्रव्यं पल्लवतश्च्युतं यदि भवेत्क्वापि प्रमादात्तदा
शोकायाथ तदर्पितं श्रुतवते तोषाय च श्रेयसे ।
स्वातन्त्र्याद्विषयाः प्रयान्ति यदमी शोकाय ते स्युश्चिरं
संत्यक्ताः स्वयमेव चेत्सुखमयं निःश्रेयसं तन्वते ॥
जिस प्रकार असावधानतावश हाथ से गिरा हुआ पदार्थ तो शोक का कारण होता है, किन्तु यदि उसे किसी श्रोत्रिय ब्राह्मण को दान कर दिया जाय तो वही सन्तोष और शुभ गति का देने वाला हो जाता है, उसी प्रकार यदि विषय अपने-आप छूटते हैं तब तो बहुत दिनों तक खटकते रहते हैं; किन्तु यदि उन्हें अपनी इच्छा से छोड़ा जाय तो वे सुख और कल्याण के देने वाले हो जाते हैं।
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