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अध्याय 11 — कर्तृत्वभोक्तृत्व

प्रबोधसुधाकर
6 श्लोक • केवल अनुवाद
सूर्य के उदय होने पर जैसे मनुष्य ही अपने-अपने कार्यों को करते हैं, सूर्य कुछ भी नहीं करता-कराता, वैसे ही आत्मा भी न कुछ करता है, न कराता है।
अग्नि से व्याप्त हुए लोहे को दूसरे लोहे से पीटने पर क्या उसके भीतर स्थित अग्नि को भी कोई चोट लगती है?
कठोर कुठार से काठ को काटने पर क्या उसके घात-प्रतिघात से काष्ठ के भीतर रहने वाला अग्नि भी कट जाता है?
इसी प्रकार शरीर-सम्बन्ध से प्राप्त हुए सुख-दुःखो से आत्मा लिप्त नहीं होता। इस विषय में श्रुति भी बारंबार कहती है कि 'अन्य (आत्मा) तो कर्म-फल को न भोगता हुआ केवल साक्षीभाव से देखा ही करता है।'
रात्रि के समय दीपक के जलते रहने पर चोर घर में से धन चुराकर ले जाता है; क्या दीपक उसे इसके लिये प्रेरित करता या रोकता है? नहीं। इसी प्रकार आत्मा भी चित्तादि इन्द्रियों को उनके व्यापार में न नियुक्त करता है, न वियुक्त ।
घर के भीतर दैवयोग से किसी के जन्मने अथवा मर जाने पर क्या दीपक को किसी प्रकार का हर्ष या खेद होता है? नहीं। उसी प्रकार आत्मा भी चित्तादि के हर्ष-शोक में सर्वथा असंग और उदासीन साक्षीमात्र ही रहता है।
Krishjan
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