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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 11 • श्लोक 2
लोहे हुतभुग्व्याप्ते लोहान्तरताड्यमानेऽपि । तस्यान्तर्गतवह्नेः किं स्यान्निर्घातजं दुःखम् ॥
अग्नि से व्याप्त हुए लोहे को दूसरे लोहे से पीटने पर क्या उसके भीतर स्थित अग्नि को भी कोई चोट लगती है?
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