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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 11 • श्लोक 3
निष्ठुरकुठारघातैः काष्ठे संछेद्यमानेऽपि । अन्तर्वर्ती वह्निः किं घातैश्छेद्यते तद्वत् ॥
कठोर कुठार से काठ को काटने पर क्या उसके घात-प्रतिघात से काष्ठ के भीतर रहने वाला अग्नि भी कट जाता है?
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