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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 11 • श्लोक 5
निशि वेश्मनि प्रदीपे दीप्यति चौरस्तु वित्तमपहरति । ईरयति वारयति वा तं दीपः किं तथात्मापि ॥
रात्रि के समय दीपक के जलते रहने पर चोर घर में से धन चुराकर ले जाता है; क्या दीपक उसे इसके लिये प्रेरित करता या रोकता है? नहीं। इसी प्रकार आत्मा भी चित्तादि इन्द्रियों को उनके व्यापार में न नियुक्त करता है, न वियुक्त ।
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