इसी प्रकार शरीर-सम्बन्ध से प्राप्त हुए सुख-दुःखो से आत्मा लिप्त नहीं होता। इस विषय में श्रुति भी बारंबार कहती है कि 'अन्य (आत्मा) तो कर्म-फल को न भोगता हुआ केवल साक्षीभाव से देखा ही करता है।'
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