गेहान्ते दैववशात्कस्मिंश्चित्समुदिते विपन्ने वा ।
दीपस्तुष्यत्यथवा खिद्यति किं तद्वदात्मापि ॥
घर के भीतर दैवयोग से किसी के जन्मने अथवा मर जाने पर क्या दीपक को किसी प्रकार का हर्ष या खेद होता है? नहीं। उसी प्रकार आत्मा भी चित्तादि के हर्ष-शोक में सर्वथा असंग और उदासीन साक्षीमात्र ही रहता है।
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