Krishjan
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अध्याय 1 — प्रथमः खण्डः
केन
8 श्लोक • केवल अनुवाद
मन
किसके प्रेरित होने पर अपने विषयों की ओर जाता है?
प्राण
, जो सबसे प्रमुख है, किसके द्वारा नियोजित होकर कार्य करता है? लोग
वाणी
को किसकी प्रेरणा से बोलते हैं? और
नेत्र
तथा
श्रवण-इन्द्रिय
को कौन-सा
देव
(चेतन तत्त्व)
प्रेरित और संचालित करता है?
जो
श्रवण-इन्द्रिय का भी श्रवण-स्वरूप
है,
मन का भी मन
है,
वाणी की भी वाणी
है,
प्राण का भी प्राण
है, और
नेत्र का भी नेत्र
है, उसी
परमात्मतत्त्व
को जानकर
धीर पुरुष
(तत्त्वज्ञानी)
इन्द्रियों के साथ अपनी मिथ्या पहचान का त्याग कर, इस संसार से मुक्त होकर
अमृतत्व
(मोक्ष)
को प्राप्त हो जाते हैं।
वहाँ
नेत्र
नहीं पहुँच सकता,
वाणी
नहीं पहुँच सकती, और
मन
भी नहीं पहुँच सकता। हम नहीं जानते कि उसका उपदेश किस प्रकार किया जाए, और न ही यह जानते हैं कि उसे किस प्रकार समझाया जा सकता है। वह
ज्ञात वस्तुओं
से
भिन्न
है और
अज्ञात
से भी
परे
है। ऐसा हमने उन
प्राचीन तत्त्वदर्शी आचार्यों
से सुना है, जिन्होंने हमें इस तत्त्व का यथार्थ उपदेश किया है।
जिसे
वाणी व्यक्त नहीं कर सकती
, किन्तु
जिसकी शक्ति से वाणी बोलती है
, उसी को
तू ब्रह्म जान
; यह नहीं, जिसकी लोग
उपासना
(विषय या सीमित रूप के रूप में)
करते हैं।
जिसका
मन द्वारा चिन्तन नहीं किया जा सकता
, किन्तु
जिसकी शक्ति से मन विचार करता है
, उसी को
तू ब्रह्म जान
; यह नहीं, जिसकी लोग
उपासना
(सीमित विषय या कल्पित रूप के रूप में)
करते हैं।
जिसे
नेत्र
नहीं देख सकते, किन्तु
जिसकी शक्ति से नेत्र देखते हैं
, उसी को
तू ब्रह्म जान
; यह नहीं, जिसकी लोग
उपासना
(सीमित दृश्य रूप में)
करते हैं।
जिसे
श्रवण-इन्द्रिय
नहीं सुन सकती, किन्तु
जिसकी शक्ति से यह श्रवण-इन्द्रिय सुनती है
, उसी को
तू ब्रह्म जान
; यह नहीं, जिसकी लोग
उपासना
(सीमित श्रव्य या कल्पित रूप में)
करते हैं।
जिसे
प्राण
प्राणित
(जीवित अथवा संचालित)
नहीं कर सकता, किन्तु
जिसकी शक्ति से प्राण
संचालित होता है, उसी को
तू ब्रह्म जान
; यह नहीं, जिसकी लोग
उपासना
(सीमित और उपाधियुक्त रूप में)
करते हैं।
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