जिसे श्रवण-इन्द्रिय नहीं सुन सकती, किन्तु जिसकी शक्ति से यह श्रवण-इन्द्रिय सुनती है, उसी को तू ब्रह्म जान; यह नहीं, जिसकी लोग उपासना(सीमित श्रव्य या कल्पित रूप में) करते हैं।
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