न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो
न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्।
अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि।
इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥
वहाँ नेत्र नहीं पहुँच सकता, वाणी नहीं पहुँच सकती, और मन भी नहीं पहुँच सकता। हम नहीं जानते कि उसका उपदेश किस प्रकार किया जाए, और न ही यह जानते हैं कि उसे किस प्रकार समझाया जा सकता है।
वह ज्ञात वस्तुओं से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है। ऐसा हमने उन प्राचीन तत्त्वदर्शी आचार्यों से सुना है, जिन्होंने हमें इस तत्त्व का यथार्थ उपदेश किया है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
केन के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।