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केन • अध्याय 1 • श्लोक 2
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यत्। वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः। चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः। प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥
जो कान का भी कान है, मन का भी मन है, वाणी की भी वाणी है, वही प्राण का भी प्राण है, और आँखों का भी आँख है। उस (तत्त्व) को जानकर ज्ञानी पुरुष (धीर लोग) इंद्रियों के बंधन से मुक्त होकर इस संसार से परे जाकर अमर हो जाते हैं।
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