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अध्याय 82 — अथ पद्मरागलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
11 श्लोक • केवल अनुवाद
सौगन्धिक, कुरुविन्द, स्फटिक- इन तीन प्रकार के पत्थरों से पयराग (लाल) की उत्पत्ति होती है। सौगन्धिक पत्थर से उत्पन पद्मराग प्रमर, अञ्जन, मेध या जामुन के रस के समान कान्ति बाले होते हैं।
कुरुविन्द पत्थर से उत्पन्न पद्मराग शुक्ल-कृष्यमिश्रित, मन्द कान्ति बाले और धातुओं से विद्ध होते हैं तथा स्फटिक से उत्पन्न पद्मराग कान्ति बाले, अनेक वर्ष वाले और विशुद्ध होते हैं।
स्निग्ध, कान्ति से दोपित, स्वच्छ, कान्ति से मुठ, भारी, सुन्दर आकार वाले, मध्य में प्रभायुक्त, अति लोहित, प्रेत गुणों से युक्त- ये सभी पद्मराग मणि के प्रधान गुष कहे गये हैं।
मलिन कान्ति वाले, रेखाओं से व्याप्त, मिट्टी आदि धातुओं से युत, फटे हुये, अप्रशस्त, छिद से युत, सुन्दरता से रहित, केकड़ों से युक्त-ये सभी मणियों के दोष कड़े गये हैं।
प्रमर या मयूरकण्ठ के समान वर्ष वाला, दीपशिखा के समान कान्ति बाला और अमूल्य मणि सर्पों के शिर में होता है।
जो राजा पूर्वोक्त मणि को धारण करता है, उसको कभी भी विष या रोगसम्बन्धी दोष नहीं होते। उसके राज्य में इन्द्र सदा वर्षा करते हैं और उस मणि के प्रभाव से बह राजा अपने शत्रुओं का नाश करने में समर्थ होता है।
एक अतुल्य पराग का मूल्य २९०० रुपये कर्षतुत्य पराग का मूत्य
२०००० रूपये, आधे पततुल्य पाएका मूल्य १२००० रूपये, एक कर्षतुल्य पराण का मूल्य ६००० आतुराण का
चार महते तुष्य पराग का मूल्य १००० रूपये और दो मासे तुत्य पचराण का मूल्य ५०० रूपये होता है।
कल्पना करनी चाहिये। अल्प का मूल्य नाथा, जोडीन पचराग का कुछ पूर्व
ले बहुत बाते और थोड़े गुणों से मूल्य- यांस होता है। इसके मूल्यको प्रकार देश
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