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अध्याय 36 — अथ गन्धर्वनगरलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
5 श्लोक • केवल अनुवाद
यदि उत्तर आदि दिशाओं में गन्धर्वनगर दिखाई दे तो क्रम से पुरोहित, राजा, सेनापति और युबराज का अशुभ करता है। जैसे-उत्तर दिशा में दिखाई दे तो पुरोहित, पूर्व दिशा में राजा, दक्षिण में सेनापति और पश्चिम में दिखाई दे तो युवराज का अशुभ करता है। साथ ही घेत वर्ण का हो तो ब्राह्मणों का, रक्त वर्ण का हो तो क्षत्रियों का, पौत वर्ष का हो तो वैश्यों का और कृष्ण वर्ण का हो तो शूद्रों का नाश करता है।
यदि उत्तर दिशा में गन्धर्वनगर स्थित हो तो राजाओं को विजय देने वाला होता है। विदिशा (ईशान, आग्नेय, वायव्य और नैऋत्य में स्थित हो तो संकर (नीच जाति) का नाश करता है तथा शान्त दिशा में तारायुत दिखाई दे तो राजा के विजय के लिये होता
पदि प्रतिदिन हर समय गन्धर्वनगर दिखाई दे तो राजा और राष्ट्र दोनों को भय देने बाला होता है तथा यदि धूम, अग्नि या इन्द्रधनुष की तरह कान्ति वाला हो तो चोर और बनवासियों का नाश करता है।
पाण्डुर ( बेत = 'शुक्ल-शुत्र-शुचि-प्रेत-विराद-श्येत-पाण्डुरा' इत्यमरः) वर्ण का गन्धर्वनगर दिखाई दे तो बज्रपात के साथ वायु करता है। दोप्त दिशा ( ८६ अध्याय के १२ वें पद्योक्त) में स्थित हो तो उस दिशा में स्थित राजा का मरण होता है तथा वाम में शत्रु का भय और दक्षिण में जय करता है।
जिस समय आकाश में अनेक वर्णयुत पताका, ध्वजा या पुरद्वार की तरह गन्धर्व नगर दिखाई देता है, उस समय युद्ध में हाथी, मनुष्य और घोड़ों का रक्त पृथ्वी अधिक पान करती है।
Krishjan
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