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बृहत्संहिता • अध्याय 36 • श्लोक 5
अनेकवर्णाकृति खे प्रकाशते पुरं पताकाध्वजतोरणान्वितम्। यदा तदा नागमनुष्यवाजिनां पिबत्यसृग्भूरि रणे वसुन्धरा ॥
जिस समय आकाश में अनेक वर्णयुत पताका, ध्वजा या पुरद्वार की तरह गन्धर्व नगर दिखाई देता है, उस समय युद्ध में हाथी, मनुष्य और घोड़ों का रक्त पृथ्वी अधिक पान करती है।
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