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अध्याय 31 — अथ दिग्दाहलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
5 श्लोक • केवल अनुवाद
यदि दिग्दाह पीत वर्ष का हो तो राजभय के लिये, अग्नि वर्ण का हो तो देशनाश के लिए और बायों तरफ लोहित वर्ण का यामु दिखाई दे तो धान्यों का नाश करता है।
जो दिदाह अपनी अत्यधिक कान्ति से प्रकाशित होता है और सूर्य की तरह दृश्यमान द्रव्य की छाया को भी प्रकाशित करता है, यह राजा को अधिक भय देता है तया यदि यह रक्त वर्ण का हो तो रात्र का भय करता है।
यदि पूर्व दिशा में दिग्दाह दिखाई दे तो वह राजा के साथ-साथ सभी क्षत्रियों को पीड़ित करता है। आग्नेय कोण में दिखाई दे तो शिल्पी (लुहार, सोनार आदि) और कुमारों को पीड़ित करता है। दक्षिण में दिखाई दे तो क्रूर मनुष्य, वैश्य, दूत और पुनर्भू त्रो (जो अक्षतपोनि होकर पुनः शादी करती है) को पीड़ित करता है।
पश्चिम दिशा में दिखाई दे तो शुद्र और किसानों को पीड़ित करता है। वायव्य कोण में दिखाई दे तो घोड़े के साथ चोरों को भी पीड़ित करता है। उत्तर दिशा में दिखाई दे तो ब्राह्मणों को पीड़ित करता है तथा ईशान कोग में दिग्दाह दिखाई दे तो पाखण्डी और व्यापारियों को पीड़ित करता है।
प्रसन (निर्मल) आकाश, विमल, (निर्मल) नक्षत्र, दक्षिणावर्त क्रम से पूमता हुआ वायु और सुवर्ण की तरह दिग्दाह हो तो राजा के साथ-साथ सब लोगों का हित करने वाला होता है।
Krishjan
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