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बृहत्संहिता • अध्याय 31 • श्लोक 5
नभः प्रसन्नं विमलानि भानि प्रदक्षिणं वाति सदागतिश्च । दिशां च दाहः कनकावदातो हिताय लोकस्य सपार्थिवस्य ॥
प्रसन (निर्मल) आकाश, विमल, (निर्मल) नक्षत्र, दक्षिणावर्त क्रम से पूमता हुआ वायु और सुवर्ण की तरह दिग्दाह हो तो राजा के साथ-साथ सब लोगों का हित करने वाला होता है।
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