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अध्याय 25 — अथ स्वातीयोगाध्यायः

बृहत्संहिता
6 श्लोक • केवल अनुवाद
रोहिणी योग में उक्त सभी फलों की तरह आषाढ़ शुक्ल में स्वाती नक्षत्र में स्थित बन्द्र के समस्त फलों का विचार करना चाहिये तथा इस (स्वाती योग में जो विशेष फल है, उन्हें में कहता हूँ।
स्वाती नक्षत्र में स्थित चन्द्र के समय रात-दिन दोनों के तीन-तीन भाग करे। यदि रात्रि के प्रथम भाग में वृष्टि हो तो सब धान्यों की वृद्धि, द्वितीय भाग में तिल, मूंग और उड़द की वृद्धि, तृतीय भाग में ग्रीष्म ऋतु के धान्य की उत्पत्ति और शारदीय धान्य का अभाव
दिन के प्रथम भाग में सुन्दर वृष्टि, द्वितीय भाग में कीड़े और साँपों से युत वृष्टि तथा तृतीय भाग में सृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है। यदि सम्पूर्ण दिन और रात में वृष्टि हो तो वर्षाकाल में दोषरहित वृष्टि होती है।
चित्रा के उत्तर में अपांवत्स नामक तारा है, उसके समीप में यदि स्वाती के साथ चन्द्र का संयोग हो तो शुभ होता है।
यदि माघ कृष्ण सप्तमी में स्वाती नक्षत्रगत चन्द्र होने के समय हिम गिरे, भयङ्कर वायु चले, जलयुत मेघ गर्ने, विद्युन्माला से व्याप्त आकाश रहे तथा मेघाच्छन्न होने के कारण चन्द्र, सूर्य और तारा न दिखाई दे तो वर्षाकाल में आनन्दित और सब धान्यों से युक्त जनपद जानना चाहिये ।
इसी तरह फाल्गुन, चैत्र और वैशाख के कृष्ण पक्ष में स्वाती योग का विचार करे; किन्तु आषाढ़ मास में विशेष रूप से इसका विचार करना चाहिये।
Krishjan
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