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बृहत्संहिता • अध्याय 25 • श्लोक 2
स्वातौ निशांशे प्रथमेऽभिवृष्टे सस्यानि सर्वाण्युपयान्ति वृद्धिम् । भागे द्वितीये तिलमुद्गमाषा वैष्मं तृतीयेऽस्ति न शारदानि ॥
स्वाती नक्षत्र में स्थित चन्द्र के समय रात-दिन दोनों के तीन-तीन भाग करे। यदि रात्रि के प्रथम भाग में वृष्टि हो तो सब धान्यों की वृद्धि, द्वितीय भाग में तिल, मूंग और उड़द की वृद्धि, तृतीय भाग में ग्रीष्म ऋतु के धान्य की उत्पत्ति और शारदीय धान्य का अभाव
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