Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 1 — ब्रह्मोपनिषद्
ब्रह्म
23 श्लोक • केवल अनुवाद
इस
विराट् पुरुष
के शरीर में
आत्मा
के चार प्रमुख स्थान—
नाभि
,
हृदय
,
कण्ठ
तथा
ब्रह्मरन्ध्र
—बताए गए हैं। इन चारों क्षेत्रों में
चतुर्थ चरण
से युक्त
ब्रह्म
प्रकाशित होता है। इसी प्रकार
आत्मा
की चार अवस्थाएँ—
जाग्रत्
,
स्वप्न
,
सुषुप्ति
तथा
तुरीय
—कही गई हैं। इनमें
जाग्रत् अवस्था
में
ब्रह्मा
,
स्वप्नावस्था
में
विष्णु
,
सुषुप्ति
में
रुद्र
तथा
चतुर्थ तुरीयावस्था
में
अक्षररूप परमात्मा
प्रकाशित होता रहता है। यह
आत्मतत्त्व
स्वयं
मन
तथा
हाथ-पैर
आदि
इन्द्रियों
से रहित होते हुए भी
स्वप्रकाश
कहा गया है।
यहाँ
(आत्मा अर्थात्
ब्रह्म
में)
लोक
लोकरूप में नहीं है,
देव
देवरूप में नहीं है,
वेद
वेदरूप में नहीं है,
यज्ञ
यज्ञरूप में नहीं है,
माता
मातारूप में नहीं है,
पिता
पितारूप में नहीं है,
स्नुषा
(पुत्रवधू)
स्नुषारूप में नहीं है,
चाण्डाल
चाण्डालरूप में नहीं है,
पौल्कस
(भील)
पौल्कसरूप में नहीं है,
श्रमण
(संन्यासी)
श्रमणरूप में नहीं है और
तपस्वी
तपस्वीरूप में भी नहीं है। किन्तु वह
ब्रह्म
सदा
निर्वाणस्वरूप
तथा
स्वप्रकाशस्वरूप
है।
वहाँ
(इस ब्रह्म पर)
देवगण, ऋषिगण और पितृगण भी शासन करने में समर्थ नहीं हैं। उस अविनाशी ब्रह्म को ज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है, वह सर्वविद्या के स्वरूप वाला है।
हृदय में सभी देवगण स्थित हैं, प्राण भी हृदय में निवास करता है और हृदय में ही प्राण तथा ज्योति भी प्रतिष्ठित है। इस तरह से हृदय में तीन स्वरूपों में परम ब्रह्म का निवास है।
(इस तथ्य को प्रकट करने के लिए)
तीन सूत्रों
(धागों)
से युक्त 'यज्ञ सूत्र' अर्थात् जनेऊ
(यज्ञोपवीत)
है, ऐसा उसके रहस्य को समझने वाले मानते हैं। वह अविनाशी परमब्रह्म चेतना के रूप में हृदय में प्रतिष्ठित है।
(यह)
परम पवित्र यज्ञोपवीत सर्वप्रथम प्रजापति
(ब्रह्माजी)
के साथ ही सहज
(देहेन्द्रिय की तरह)
प्रादुर्भूत हुआ। वह दीर्घायुष्य प्रदान करने वाला है।
(हे मनुष्य!)
ऐसा जान करके तुम उत्तम और शुभ्र यज्ञोपवीत धारण करो। यह यज्ञोपवीत तुम्हारे लिए बल एवं तेज प्रदान करने वाला
(सिद्ध)
हो।
शिखा के सहित मुण्डन करने के पश्चात्
(संन्यास धर्म को ग्रहण करके)
ज्ञानी जनों को ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जिस अविनाशी तत्त्व को परब्रह्म कहा गया है, वही इस सूत्र के रूप में प्रतिष्ठित है। ऐसा जान करके उसी श्रेष्ठ यज्ञोपवीत को हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए।
यज्ञोपवीत यह सूचित करता है
(कि अविनाशी शाश्वत परब्रह्म हृदय में ही स्थित है)
, इस कारण से उसे 'सूत्र' के नाम से जाना जाता है। यह 'सूत्र' ही परम पद है। इस परम पद रूपी सूत्र को जिस मनुष्य ने जान लिया, वही ब्राह्मण वेद को जानने में समर्थ अर्थात् पारगामी होता है।
जिस प्रकार सूत्र रूपी धागों में माला के रूप में मणियों के दाने पिरोये जाते हैं, उसी तरह अविनाशी ब्रह्म में यह सम्पूर्ण जगत् गुथा हुआ है, इसलिए इसे
सूत्र
कहा गया है। तत्त्वज्ञानी एवं योग में निष्णात मनुष्यों को इस सूत्र रूप ब्रह्म को हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए।
इस श्रेष्ठ योग रूपी ब्रह्मसूत्र को धारण करने वाला विद्वान् मनुष्य ब्रह्मसूत्र का परित्याग कर दे। ब्रह्म स्वरूप को जानना ही 'सूत्र' समझना चाहिए। इस 'ब्रह्मसूत्र' को जो भी मनुष्य धारण करता है, वह चैतन्य स्वरूप है। इस ब्रह्मरूपी सूत्र को धारण करने से व्यक्ति न उच्छिष्ट होता है और न ही अशुद्ध होता है।
इस शाश्वत ज्ञान रूपी यज्ञोपवीत को ग्रहण करने वाले मनुष्यों के हृदय में ब्रह्मरूपी सूत्र स्थित रहता है। इस प्रकार के ही मुनष्य ब्रह्मरूपी सूत्र के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले होते हैं तथा वे ही व्यक्ति वास्तव में सच्चे यज्ञोपवीतधारी हैं।
जो मनुष्य ज्ञानरूप शिखा वाले, ज्ञान में ही निष्ठा रखने वाले और ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को धारण करने वाले हैं, ऐसे उन श्रेष्ठ व्यक्तियों को ज्ञान ही परम पवित्र बना देता है।
जिस मनुष्य के अग्नि की शिखा की भाँति ज्ञान की शिखा होती है, उनके लिए और दूसरी अन्य शिखा होती ही नहीं है और वे ही सच्चे अर्थों में शिखा को धारण करने वाले तथा विशेष ज्ञानी कहे जाते हैं। इनके अतिरिक्त जो अन्य मनुष्य बाह्य केशों की चोटी रखते हैं, वे व्यक्ति शिखा को धारण करने वाले नहीं कहे जा सकते।
ब्राह्मण आदि जो
(वर्ण)
वैदिक कर्म के अधिकारी हैं, उन्हीं
(मनुष्यों)
को ही यह ब्रह्मसूत्र धारण करना चाहिए, क्योंकि यही इसकी कार्य पद्धति का अनिवार्य अङ्ग कहा गया है।
जिस
(ब्राह्मण)
की शिखा एवं यज्ञोपवीत दोनों ही ज्ञानस्वरूप हैं, ऐसे उन
(ब्राह्मणों)
का ब्राह्मणत्व ही पूर्ण सफल है, ऐसा ब्रह्मपरायण विद्वज्जन कहते हैं।
यह
(ज्ञान ही)
यज्ञोपवीत है, यही परम पवित्र और परायण अर्थात् कल्याणकारी है। अतः ज्ञानवान् मनुष्य ही वास्तव में
(सच्चे)
यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं, स्वयं यज्ञरूप हैं और उन्हीं श्रेष्ठ पुरुषों को '
यज्वा
' कहते हैं।
एक ही परमात्मा समस्त भूत-प्राणियों में विद्यमान
(छिपा हुआ)
है,
(वह)
सर्वव्यापी है। समस्त भूतों का अन्तरात्मा है, सभी के कर्मों को नियन्त्रित रखने वाला है, सभी भूतों का अधिवास है, साक्षीरूप, चैतन्य स्वरूप, पवित्र एवं निर्गुण
(त्रिगुणातीत)
है।
वह
(परमात्मा)
एक होते हुए भी सभी को वश में रखने वाला है, सभी प्राणियों का अन्तरात्मा है तथा अपने एक ही रूप को विभिन्न रूपों में प्रकट करता है। इस परम तत्त्व को जो बुद्धिमान् व्यक्ति अपने में प्रतिष्ठित देखते हैं, उन्हें शाश्वत शान्ति की प्राप्ति होती है, दूसरों को इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती।
आत्मा को नीचे की अरणि और प्रणव को ऊर्ध्व की अरणि बनाकर ध्यान रूपी मंथन के अभ्यास द्वारा इस अप्रकट आत्मा का साक्षात्कार मनुष्य को करना चाहिए।
जिस प्रकार तिल में तैल, दही में घृत, स्रोत के प्रवाह में जल, काष्ठ में अग्नि अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहती है, उसी प्रकार से आत्मा भी हमारे अन्तःकरण में विद्यमान है। वह आत्मा सत्य एवं तप के द्वारा देखा जा सकता है।
जिस प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) तन्तु (सूत्र) का सृजन एवं संहार अर्थात् सूत्र का निर्माण करती और पुनः खींच (निगल) लेती है, उसी प्रकार जीवात्मा भी जाग्रत् एवं स्वप्नावस्था में पुनः पुनः गमनागमन करता रहता है।
जाग्रत् अवस्था का वैश्वानर नाम से युक्त आत्मा चक्षु में प्रतिष्ठित रहता है, स्वप्रावस्था का तैजस नामक आत्मा कण्ठ में निवास करता है, सुषुप्तावस्था का प्राज्ञ नामक आत्मा हृदय में स्थित रहता है और तुरीय अर्थात् तीनों अवस्थाओं से परे इस तुर्या नामक चौथी अवस्था का आत्मा ब्रह्मरन्ध्र में निवास करता है, इस प्रकार से बुद्धिमान् मनुष्य को जानना चाहिए।
जहाँ मनुष्य की वाक्शक्ति एवं एकादश इन्द्रिय मन नहीं पहुँच सकते, वहाँ पर उस आत्मा के आनन्द को जान करके बुद्धिमान् मनुष्य मुक्त हो जाते हैं।
दुग्ध में घृत के सदृश सर्वत्र विद्यमान आत्म तत्त्व, आत्म-विद्या एवं तप के द्वारा ही प्राप्त होता है। यह आत्मा ही स्वयं ब्रह्म है और यही उपनिषदों का परम पद
(परब्रह्म)
है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें