अध्याय 1 — ब्रह्मोपनिषद्
ब्रह्म
23 श्लोक • केवल अनुवाद
यहाँ (आत्मा अर्थात् ब्रह्म में) लोक - लोक के रूप में नहीं है, देव - देवरूप में नहीं है, वेद - वेदरूप में नहीं है, यज्ञ - यज्ञरूप में नहीं है, माता - माता के रूप में नहीं है, पिता - पितारूप में नहीं है, स्नुषा (पुत्रवधू) - स्नुषा रूप में नहीं है, चाण्डाल - चाण्डालरूप में नहीं है, पौल्कस (भील) - पौल्कस रूप में नहीं है, श्रमण (संन्यासी) - श्रमण के रूप में नहीं है, और तपस्वी - तपस्वी के रूप में नहीं है; किन्तु वह ब्रह्म सदैव एक निर्वाण स्वरूप एवं प्रकाश स्वरूप है।