ऊर्णनाभिर्यथा तन्तून्सृजते संहरत्यपि।
जाग्रत्स्वप्ने तथा जीवो गच्छत्यागच्छते पुनः ॥
जिस प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) तन्तु (सूत्र) का सृजन एवं संहार अर्थात् सूत्र का निर्माण करती और पुनः खींच (निगल) लेती है, उसी प्रकार जीवात्मा भी जाग्रत् एवं स्वप्नावस्था में पुनः पुनः गमनागमन करता रहता है।
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