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ब्रह्म • अध्याय 1 • श्लोक 23
सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवान्वितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्पदं त‌द्ब्रह्मोपनिषत्पदमिति ॥
दुग्ध में घृत के सदृश सर्वत्र विद्यमान आत्म तत्त्व, आत्म-विद्या एवं तप के द्वारा ही प्राप्त होता है। यह आत्मा ही स्वयं ब्रह्म है और यही उपनिषदों का परम पद (परब्रह्म) है।
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