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ब्रह्म • अध्याय 1 • श्लोक 15
इदं यज्ञोपवीतं तु पवित्रं यत्परायणम् । स विद्वान्यज्ञोपवीती स्यात्स यज्ञः तं यञ्चानं विदुः ॥
यह (ज्ञान ही) यज्ञोपवीत है, यही परम पवित्र और परायण अर्थात् कल्याणकारी है। अतः ज्ञानवान् मनुष्य ही वास्तव में (सच्चे) यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं, स्वयं यज्ञरूप हैं और उन्हीं श्रेष्ठ पुरुषों को 'यज्वा' कहते हैं।
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