यत्र लोका न लोका देवा न देवा वेदा न वेदा यंज्ञा न यज्ञा माता न माता पिता न पिता स्नुषा न स्नुषा चाण्डालो न चाण्डालः पौल्कसो न पौल्कसः श्रमणो न श्रमणः तापसो न तापस इत्येकमेव परं ब्रह्य विभाति निर्वाणम् ॥
यहाँ (आत्मा अर्थात् ब्रह्म में)लोक लोकरूप में नहीं है, देव देवरूप में नहीं है, वेद वेदरूप में नहीं है, यज्ञ यज्ञरूप में नहीं है, माता मातारूप में नहीं है, पिता पितारूप में नहीं है, स्नुषा(पुत्रवधू) स्नुषारूप में नहीं है, चाण्डाल चाण्डालरूप में नहीं है, पौल्कस(भील) पौल्कसरूप में नहीं है, श्रमण(संन्यासी) श्रमणरूप में नहीं है और तपस्वी तपस्वीरूप में भी नहीं है।
किन्तु वह ब्रह्म सदा निर्वाणस्वरूप तथा स्वप्रकाशस्वरूप है।
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