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अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
भगवद गीता
78 श्लोक • केवल अनुवाद
अर्जुन ने कहा - हे महाबाहु! मैं संन्यास और त्याग की प्रकृति के संबंध में जानना चाहता हूँ। हे केशिनिषूदन, हे हृषिकेश! मैं दोनों के बीच का भेद जानने का भी इच्छुक हूँ।
श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्यकर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मों को दोष की तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ दान और तपरूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिये।
श्रीभगवान् बोले - कई विद्वान् काम्य-कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मों को दोष की तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिये।
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! तू संन्यास और त्याग - इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।
यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप - ये तीनों ही कर्म मनीषियों को पवित्र करने वाले हैं।
हे पार्थ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप) इन कर्मों को तथा दूसरे भी कर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके करना चाहिये - यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।
नियत कर्म का तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।
जो कुछ कर्म है, वह दुखरूप ही है - ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेश के भय से उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्याग के फल को नहीं पाता।
हे अर्जुन! केवल कर्तव्यमात्र करना है - ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
जो अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूप में स्थित है।
कारण कि देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है - ऐसा कहा जाता है।
कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों को कर्मों का इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित - ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के बाद भी होता है; परन्तु कर्मफल का त्याग करने वालों को कहीं भी नहीं होता।
हे महाबाहो! कर्मों का अन्त करने वाले सांख्य सिद्धान्त में सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरे से समझ।
इसमें (कर्मों की सिद्धि में) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकार के करण एवं विविध प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।
मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं।
परन्तु ऐसे पाँच हेतुओं के होने पर भी जो उस (कर्मों के) विषय में केवल (शुद्ध) आत्मा को कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।
जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियों को मारकर भी न मारता है और न बँधता है।
ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता - इन तीनों से कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता - इन तीनों से कर्मसंग्रह होता है।
गुणसंख्यान (गुणों के सम्बन्ध से प्रत्येक पदार्थ के भिन्न-भिन्न भेदों की गणना करने वाले) शास्त्र में गुणों के भेद से ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकार से ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूप से सुनो।
जिस ज्ञान के द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियों में विभागरहित एक अविनाशी भाव (सत्ता) को देखता है उस ज्ञान को तुम सात्त्विक समझो।
परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियों में अलग-अलग अनेक भावों को अलग-अलग रूप से जानता है, उस ज्ञान को तुम राजस समझो।
किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञान से रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमान से रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्य के द्वारा बिना राग-द्वेष के किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।
परन्तु जो कर्म भोगों को चाहने वाले मनुष्य के द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है।
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धि में निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।
जो कर्ता रागी, कर्मफल की इच्छा वाला, लोभी, हिंसा के स्वभाव वाला, अशुद्ध और हर्षशोक से युक्त है, वह राजस कहा गया है।
जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारी का अपकार करने वाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है।
हे धनञ्जय! अब तू गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति के भी तीन प्रकार के भेद अलग-अलग रूप से सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूप से कहे जा रहे हैं।
हे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बन्धन और मोक्ष को जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।
हे पार्थ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्म को, कर्तव्य और अकर्तव्य को भी ठीक तरह से नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
हे पृथानन्दन! तमोगुण से घिरी हुई जो बुद्धि अधर्म को धर्म और सम्पूर्ण चीजों को उलटा मान लेती है, वह तामसी है।
हे पार्थ! समता से युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृति के द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।
हे पृथानन्दन अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धृति के द्वारा धर्म, काम (भोग) और अर्थ को अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है।
हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृति के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुख और घमण्ड को भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! अब तीन प्रकार के सुख को भी तुम मेरे से सुनो। जिसमें अभ्यास से रमण होता है और जिससे दुखों का अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धि की प्रसन्नता से पैदा होने वाला जो सुख (सांसारिक आसक्ति के कारण) आरम्भ में विष की तरह और परिणाम में अमृत की तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! अब तीन प्रकार के सुख को भी तुम मेरे से सुनो। जिसमें अभ्यास से रमण होता है और जिससे दुखों का अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धि की प्रसन्नता से पैदा होने वाला जो सुख (सांसारिक आसक्ति के कारण) आरम्भ में विष की तरह और परिणाम में अमृत की तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संयोग से आरम्भ में अमृत की तरह और परिणाम में विष की तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।
निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होने वाला जो सुख आरम्भ में और परिणाम में अपने को मोहित करने वाला है, वह सुख तामस कहा गया है।
पृथ्वी में या स्वर्ग में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो।
हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए तीनों गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं।
मन का निग्रह करना इन्द्रियों को वश में करना; धर्मपालन के लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतर से शुद्ध रहना; दूसरों के अपराध को क्षमा करना; शरीर, मन आदि में सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदि का ज्ञान होना; यज्ञविधि को अनुभव में लाना; और परमात्मा, वेद आदि में आस्तिक भाव रखना - ये सब के सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजा के संचालन आदि की विशेष चतुरता, युद्ध में कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करने का भाव - ये सब के सब क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
खेती करना, गायों की रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना - ये सब के सब वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है।
अपने-अपने कर्म में तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को प्राप्त होता है उस प्रकार को तू मेरे से सुन।
जिस परमात्मा से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्मा का अपने कर्म के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
अच्छी तरह से अनुष्ठान किये हुए परधर्म से गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
हे कुन्तीनन्दन! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म का त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँ से अग्नि की तरह किसी न किसी दोष से युक्त हैं।
जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीर को वश में कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोग के द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
हे कौन्तेय! सिद्धि (अन्तःकरण की शुद्धि) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्म को, जो कि ज्ञान की परा निष्ठा है, जिस प्रकार से प्राप्त होता है, उस प्रकार को तुम मुझ से संक्षेप में ही समझो।
जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धि से युक्त, वैराग्य के आश्रित, एकान्तका सेवन करने वाला और नियमित भोजन करने वाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियों का नियमन करके, शरीर वाणी मन को वश में करके, शब्दादि विषयों का त्याग करके और राग-द्वेष को छोड़कर निरन्तर ध्यानयोग के परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्ति का पात्र हो जाता है।
जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धि से युक्त, वैराग्य के आश्रित, एकान्तका सेवन करने वाला और नियमित भोजन करने वाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियों का नियमन करके, शरीर वाणी मन को वश में करके, शब्दादि विषयों का त्याग करके और राग-द्वेष को छोड़कर निरन्तर ध्यानयोग के परायण हो जाता है
वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्ति का पात्र हो जाता है।
वह ब्रह्मभूत-अवस्था को प्राप्त प्रसन्न मन वाला साधक न तो किसी के लिये शोक करता है और न किसी की इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियों में समभाववाला साधक मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है।
उस पराभक्ति से मेरे को, मैं जितना हूँ और जो हूँ - इसको तत्त्व से जान लेता है तथा मेरे को तत्त्व से जानकर फिर तत्काल मेरे में प्रविष्ट हो जाता है।
मेरा आश्रय लेने वाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद को प्राप्त हो जाता है।
चित्त से सम्पूर्ण कर्म मुझ में अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समता का आश्रय लेकर निरन्तर मुझ में चित्तवाला हो जा।
मेरे में चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से सम्पूर्ण विघ्नों को तर जायगा और यदि तू अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा।
अहंकार का आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरे को युद्ध में लगा देगी।
हे कुन्तीनन्दन ! अपने स्वभावजन्य कर्म से बँधा हुआ तू मोह के कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू (क्षात्र-प्रकृति के) परवश होकर करेगा।
हे अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में रहता है और अपनी माया से शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को (उनके स्वभाव के अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! तू सर्वभाव से उस ईश्वर की ही शरण में चला जा। उसकी कृपा से तू परमशान्ति (संसार से सर्वथा उपरति) को और अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जायगा।
यह गुह्य से भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इस पर अच्छी तरह से विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।
सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरे से सुन। तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हित की बात कहूँगा।
तू मेरा भक्त हो जा, मेरे में मन वाला हो जा, मेरा पूजन करने वाला हो जा और मेरे को नमस्कार कर। ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त हो जायगा - यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।
सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।
यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वी को मत कहना; अभक्त को कभी मत कहना; जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना; और जो मेरे में दोषदृष्टि करता है, उससे भी मत कहना।
मेरे में पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवाद (गीताग्रन्थ) को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा - इसमें कोई सन्देह नहीं है।
उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है और इस भूमण्डल पर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।
जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा - ऐसा मेरा मत है।
श्रद्धावान् और दोषदृष्टि से रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थ को सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर पुण्यकारियों के शुभ लोकों को प्राप्त हो जायगा।
हे पृथानन्दन! क्या तुमने एकाग्र-चित्त से इसको सुना? और हे धनञ्जय! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ?
अर्जुन बोले - हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
सञ्जय बोले - इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुन का यह रोमाञ्चित करने वाला अद्भुत संवाद सुना।
व्यास जी की कृपा से मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग (गीता-ग्रन्थ) को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण से सुना है।
हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस पवित्र और अद्भुत संवाद को याद कर कर के मैं बार बार हर्षित हो रहा हूँ।
हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण के उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूप को याद कर कर के मेरे को बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बार बार हर्षित हो रहा हूँ।
जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है - ऐसा मेरा मत है।
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