श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्यकर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मों को दोष की तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ दान और तपरूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिये।
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