तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः।।
हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण के उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूप को याद कर कर के मेरे को बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बार बार हर्षित हो रहा हूँ।
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