असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।।
जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीर को वश में कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोग के द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
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